दीपक मदान
हरिद्वार/ जब भी बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम आते हैं, न्यूज़ चैनलों और अखबारों के फ्रंट पेज ‘99%’ और ‘95%’ लाने वाले चेहरों से भर जाते हैं। चकाचौंध वाली तस्वीरों और भारी-भरकम इंटरव्यू के बीच एक बुनियादी सवाल कहीं गुम हो जाता है—क्या शिक्षा का मकसद सिर्फ नंबरों की रेस है या ज्ञान का विकास?

प्राइवेट स्कूलों का ‘मार्क्स मार्केटिंग’ खेल
आजकल निजी स्कूलों के लिए बोर्ड रिजल्ट एक ‘मार्केटिंग इवेंट’ बन चुका है। भारी-भरकम फीस वसूलने वाले ये स्कूल अपने टॉपर्स को ढाल बनाकर नए एडमिशन खींचने का काम करते हैं। यहाँ सवाल यह उठता है कि जिन बच्चों को हर तरह की सुख-सुविधा, ट्यूशन और एक्स्ट्रा क्लास दी गई, अगर वे नंबर ले भी आए तो इसमें “असाधारण” क्या है? असली चुनौती तो उन छात्रों के पास है जिनके पास न निजी ट्यूशन है, न ही एयर-कंडीशंड क्लासरूम।
सरकारी स्कूलों की अनदेखी क्यों?
उत्तराखंड बोर्ड (UBSE) और अन्य सरकारी स्कूलों के छात्र अक्सर प्रतिकूल परिस्थितियों में पढ़ाई करते हैं। कई छात्र खेती-बाड़ी में हाथ बंटाते हैं या लंबी दूरी तय कर स्कूल पहुँचते हैं।
हकीकत: सरकारी स्कूल के छात्र का 75% या 80% लाना, प्राइवेट स्कूल के छात्र के 95% से कहीं अधिक संघर्षपूर्ण और सराहनीय है।

मीडिया का रुख: विडंबना यह है कि मुख्यधारा का मीडिया (Mainstream Media) इन ‘जमीनी नायकों’ की सफलता को वह जगह नहीं देता, जो चंद ‘कुलीन’ स्कूलों के बच्चों को दी जाती है। इसे ‘पब्लिक को गुमराह करना’ नहीं तो और क्या कहें?
’गोदी मीडिया’ और चमक-धमक की पत्रकारिता
मीडिया का एक बड़ा हिस्सा शिक्षा की गुणवत्ता, गिरते शिक्षण स्तर और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर बात करने के बजाय सिर्फ ‘टॉपर्स’ की कहानियाँ बेच रहा है। यह एक ऐसा मायाजाल बुना जा रहा है जहाँ अभिभावकों को लगता है कि अगर उनका बच्चा 95% नहीं लाया, तो वह पिछड़ गया है। यह मानसिक दबाव बच्चों में अवसाद (Depression) का कारण बन रहा है।
सुधार संवाद की राय: अब जागने का वक्त है
शिक्षा को व्यापार बनाने वाले संस्थान और उन्हें बढ़ावा देने वाला मीडिया आज कटघरे में है। हमें यह समझना होगा कि:
प्रतिभा स्कूल की बिल्डिंग से नहीं, छात्र की मेहनत से तय होती है।
सरकारी स्कूलों के शिक्षकों और छात्रों की उपलब्धि को मुख्यधारा में लाना जरूरी है।
नंबरों की इस अंधी दौड़ को रोककर ‘कौशल और ज्ञान’ पर ध्यान देना अनिवार्य है।
निष्कर्ष:
वक्त आ गया है कि जनता इस ‘ब्रैंडिंग’ के खेल को समझे। हमें अपने बच्चों को सिर्फ ‘रट्टू तोता’ बनाने के बजाय जागरूक नागरिक बनाना होगा। अगली बार जब आप टीवी पर किसी 99% वाले की फोटो देखें, तो एक बार अपने पास के उस सरकारी स्कूल के बच्चे की पीठ भी थपथपाएं जो बिजली न होने पर भी लालटेन की रोशनी में पढ़कर सम्मानजनक नंबर लाया है।
ब्यूरो रिपोर्ट: सुधार संवाद
(सत्य, साहस और सरोकार)
