दीपक मदान
हरिद्वार। धर्मनगरी में जहाँ एक ओर हम संस्कारों की शिक्षा की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर यहाँ के निजी स्कूलों ने शिक्षा को पूरी तरह ‘व्यापार’ में तब्दील कर दिया है। ‘सुधार संवाद’ की पड़ताल में सामने आया है कि हरिद्वार और आसपास के क्षेत्रों में संचालित अधिकांश निजी स्कूल शिक्षा विभाग के नियमों को ताक पर रखकर अभिभावकों का शोषण कर रहे हैं। भारी बस्ता और ‘कमीशन’ की किताबें यूकेजी और पहली कक्षा के बच्चों पर इतना बोझ डाल दिया गया है कि उनका मानसिक विकास रुक गया है। स्कूलों ने निजी प्रकाशकों (Publishers) के साथ सांठगांठ कर ऐसी किताबें लगा रखी हैं, जिनकी कीमत आसमान छू रही है। एनसीईआरटी (NCERT) की सस्ती किताबों को दरकिनार कर, भारी कमीशन के चक्कर में महंगी और कठिन किताबें थोपी जा रही हैं।

दीपक मदान की रिपोर्ट: जमीनी हकीकत के कुछ चुभते सवाल:
शिक्षकों की योग्यता पर सवाल: हरिद्वार के कई स्कूलों में मात्र 7,000 से 10,000 रुपये के वेतन पर अप्रशिक्षित (Non-B.Ed) टीचर रखे गए हैं। जो खुद सही से शिक्षित नहीं, वे हमारे बच्चों की नींव कैसे मजबूत करेंगे?
सुरक्षा से पल्ला झाड़ते स्कूल: ऑटो और वैन की जिम्मेदारी लेने से स्कूल साफ मना कर देते हैं। क्या स्कूल प्रशासन का काम केवल फीस वसूलना है? बच्चों की सुरक्षा की जवाबदेही किसकी?
मेंटेनेंस और एनुअल डे के नाम पर वसूली: फीस के अलावा हर महीने किसी न किसी फंक्शन के नाम पर अवैध वसूली जारी है। गरीब और मध्यमवर्गीय अभिभावक कर्ज लेकर बच्चों को पढ़ाने पर मजबूर हैं।

प्रशासन की चुप्पी और भ्रष्टाचार का खेल
हैरानी की बात यह है कि शिक्षा विभाग के अधिकारी सब कुछ जानकर भी अनजान बने हुए हैं। कागजों पर औचक निरीक्षण तो दिखाए जाते हैं, लेकिन क्या कभी किसी अधिकारी ने क्लास में जाकर छोटे बच्चे की कॉपी चेक की? क्या कभी पूछा कि टीचर को कितनी सैलरी मिल रही है?
”सुधार संवाद” का सीधा सवाल:
क्या माननीय मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री जी हरिद्वार के इन ‘शिक्षा माफियाओं’ पर लगाम कस पाएंगे? क्या विभाग में बैठे अधिकारी कभी इन स्कूलों की फर्जी डिग्री वाले शिक्षकों और कमीशनखोरी की जांच करेंगे?
संपादकीय टिप्पणी:
अगर समय रहते इन स्कूलों पर लगाम नहीं कसी गई, तो आने वाली पीढ़ी का भविष्य अंधकार में होगा। ‘सुधार संवाद’ इस मुहिम को तब तक जारी रखेगा जब तक धरातल पर बदलाव नहीं दिखता।
