सम्पादक :- दीपक मदान
नैनबाग (टिहरी गढ़वाल): डिजिटल इंडिया और सड़कों के जाल बिछाने के बड़े-बड़े दावों के बीच उत्तराखंड के सुदूरवर्ती गांवों की हकीकत आज भी रूह कंपा देने वाली है। मसूरी से महज 52 किलोमीटर और तहसील नैनबाग से 14 किमी की दूरी पर स्थित खरक गांव (ग्राम पंचायत सुरांसू) आज भी सड़क जैसी बुनियादी सुविधा के लिए तरस रहा है। यह रिपोर्ट उस सिस्टम के मुंह पर तमाचा है जो कागजों में विकास की गंगा बहाने का दावा करता है।
खच्चरों पर फसल और ‘टब’ में जिंदगी
हैरानी की बात है कि 2026 में भी, जब हम चांद पर पहुंचने की बात करते हैं, खरक गांव में बीमार व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने के लिए ‘डंडी-कंडी’ या प्लास्टिक के टब का सहारा लेना पड़ता है।
गर्भवती महिलाओं पर संकट: सड़क न होने के कारण कई बार गर्भवती महिलाओं और गंभीर मरीजों की जान पर बन आती है।
किसानों की कमर टूटी: गांव की नकदी फसलों को सड़क तक पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को या तो घोड़ों-खच्चरों का सहारा लेना पड़ता है या फिर खुद अपनी पीठ पर बोझ ढोना पड़ता है। मेहनत की कमाई का आधा हिस्सा तो ढुलाई में ही खर्च हो जाता है।
फाइलों में दफन ‘सड़क’: आखिर बजट गया कहां?
खरक गांव के लोग पिछले 25 वर्षों से सड़क की मांग कर रहे हैं। ग्रामीणों की व्यथा सुनकर सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठते हैं:
अधूरी योजनाएं: पूर्व प्रधान सरदार सिंह रावत के अनुसार, मसोन-जैद्वार-काण्डी मार्ग को खरक पहुंचना था, लेकिन उसे जैद्वार में ही रोक दिया गया।
2007 से इंतज़ार: 2003-04 में स्वीकृत ‘सुमन क्यारी बणगांव सुरांसू काण्डी’ मोटर मार्ग 2007 में सुरांसू तक तो पहुंचा, लेकिन खरक गांव तक का हिस्सा ‘लापता’ हो गया।
नेताओं के खोखले वादे: चुनाव आते ही जनप्रतिनिधि गांव की धूल फांकते हैं, लंबे-चौड़े वादे करते हैं और जीतते ही खरक की याददाश्त फाइलों में कहीं खो जाती है।
कागजों में विकास या सिर्फ ‘ढोल’ की गूंज?
ग्रामीणों ने पीडब्ल्यूडी (PWD) के अधिशासी अभियंता से लेकर मुख्यमंत्री और लोनिवि मंत्री तक गुहार लगाई, लेकिन नतीजा सिफर रहा।
बड़ा सवाल: केंद्र सरकार सड़क कनेक्टिविटी के लिए करोड़ों-अरबों का बजट आवंटित करती है, लेकिन उत्तराखंड के इन गांवों में वह पैसा कहां जा रहा है?
प्रशासन की नींद: क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है? कागजों में काम दिखाना और धरातल पर शून्य होना ही क्या अब उत्तराखंड का ‘विकास मॉडल’ बन गया है?
जनता की हुंकार: अब वादे नहीं, डामर चाहिए
खरक गांव के ग्रामीणों का अब धैर्य जवाब दे रहा है। खाली ढोल पीटने से जनता का पेट नहीं भरता और न ही उसे इलाज मिलता है। प्रशासन और सरकार को यह समझना होगा कि बिना सड़क के ये गांव खाली हो जाएंगे और फिर मुख्यमंत्री के ‘पलायन रोकने’ के दावों का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा।
प्रशासन को खुली चुनौती: क्या इस बार भी फाइलें सिर्फ धूल फांकेंगी, या खरक गांव के लोगों को उनका हक (सड़क) मिलेगा? अधिकारियों को अब जवाब देना होगा कि आखिर वह अरबों रुपया कहां लगा जो खरक की गलियों तक नहीं पहुंच पाया?
