सम्पादक :- दीपक मदान
पौड़ी गढ़वाल (उत्तराखंड): उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने पैतृक गांव पंचूर में श्री विष्णु पंचदेव मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल हुए। भक्तिमय माहौल के बीच योगी का संबोधन केवल धार्मिक नहीं रहा, बल्कि उन्होंने उत्तराखंड के सबसे दर्दनाक जख्म ‘पलायन’ पर सीधी चोट की। योगी ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि उत्तराखंड के पहाड़ों से होता पलायन केवल आर्थिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह हमारी उस संस्कृति और विरासत का अंत है जिसे हमारे पूर्वजों ने सदियों तक सहेज कर रखा था।
”जंगली जानवर नहीं, इच्छाशक्ति की कमी है कारण”
अक्सर पहाड़ में खेती छोड़ने के पीछे जंगली जानवरों (सूअर और बंदरों) का तर्क दिया जाता है। इस पर योगी आदित्यनाथ ने आईना दिखाते हुए कहा:
ऐतिहासिक संदर्भ: जंगली जानवर पहले भी थे, लेकिन तब लोग अधिक सजग और पुरुषार्थी थे।
झाड़ियों में तब्दील होते खेत: जो खेत कभी फसलों से लहलहाते थे, आज वहां झाड़ियां और सन्नाटा है। यह केवल खेती का नुकसान नहीं, बल्कि जड़ों से कटने का प्रतीक है।
विकल्प ही समाधान है: मुख्यमंत्री ने सुझाव दिया कि यदि पारंपरिक फसलें (धान-गेहूं) नुकसान का शिकार हो रही हैं, तो किसानों को बागवानी (Horticulture), जड़ी-बूटी और नकदी फसलों की ओर मुड़ना चाहिए।
सांस्कृतिक पहचान पर संकट
योगी ने भावुक होते हुए कहा कि जब कोई व्यक्ति गांव और जमीन छोड़ता है, तो वह अनजाने में अपनी पहचान भी खो देता है।
”समय-समय पर अपने गांव आना, कुल देवताओं की पूजा करना और अपनी जड़ों से जुड़ना ही वह ‘पुरुषार्थ’ है जो समाज को जीवित रखता है।”
धरातल की हकीकत: सरकारी आंकड़ों से इतर का दर्द
पलायन आयोग की रिपोर्टें बताती हैं कि उत्तराखंड में हजारों गांव ‘घोस्ट विलेज’ (भूतिया गांव) बन चुके हैं। योगी का यह बयान उस समय आया है जब राज्य में ‘लैंड जिहाद’ और ‘मूल निवास’ जैसे मुद्दों पर बहस छिड़ी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पहाड़ों में स्वरोजगार और बागवानी को क्लस्टर आधारित (Cluster Based) प्रोत्साहन नहीं मिला, तो विरासत केवल तस्वीरों में रह जाएगी।
निष्कर्ष: कड़वा सच
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का यह आह्वान प्रशासन और जनता दोनों के लिए एक चेतावनी है। प्रशासन को जहां ‘खेती बचाओ’ की कागजी योजनाओं से बाहर निकलकर धरातल पर जंगली जानवरों से सुरक्षा और बागवानी के बाजार उपलब्ध कराने होंगे, वहीं पहाड़ के युवाओं को भी अपनी बंजर होती धरती को फिर से आबाद करने का संकल्प लेना होगा।
क्योंकि यदि गांव खाली रहेंगे, तो मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा का आध्यात्मिक पुण्य आने वाली पीढ़ियों तक कैसे पहुंचेगा?
