दीपक मदान
उत्तराखंड हरिद्वार | सुधार संवाद ब्यूरो उत्तराखंड में नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के साथ ही प्राइवेट स्कूलों की ‘मनमानी’ और ‘लूट’ का नंगा नाच शुरू हो गया है। शिक्षा का मंदिर कहे जाने वाले ये स्कूल अब व्यापारिक केंद्र बन चुके हैं, जहाँ अभिभावकों की जेब पर डाका डाला जा रहा है। सुधार संवाद आज प्रशासन और सरकार से सीधा सवाल पूछ रहा है—आखिर यह खामोशी क्यों? क्या नेताओं और अफसरों की इन स्कूलों में हिस्सेदारी है?

नर्सरी के बच्चे का ‘हजारों’ का बिल: शिक्षा या उगाही?
जरा सोचिए, जिस बच्चे को अभी ठीक से वर्णमाला नहीं पता, उसकी किताबों का बिल हजारों में आ रहा है। प्राइवेट स्कूल एनसीईआरटी (NCERT) की सस्ती और मानक किताबों को दरकिनार कर निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें थोप रहे हैं।
कमीशन का खेल: एक ही डीलर, चुनिंदा दुकानें और स्कूल का फिक्स कमीशन। यह एक ऐसा नेक्सस (Nexus) है जिसने आम आदमी की कमर तोड़ दी है।
सवाल: क्या उत्तराखंड में शिक्षा के नियम केवल कागजों तक सीमित हैं?
फीस के नाम पर ‘अघोषित लूट’
किताबों के अलावा स्कूलों ने वसूली के नए-नए तरीके ईजाद कर लिए हैं:
सालाना मेंटेनेंस चार्ज: एक ही स्कूल में सालों से पढ़ रहे बच्चे से हर साल ‘रिपेयर’ और ‘मेंटेनेंस’ के नाम पर मोटी रकम वसूली जा रही है। क्या स्कूल हर साल दोबारा बनते हैं?
एडवांस फीस का दबाव: सत्र शुरू होने से पहले ही एडवांस फीस और बढ़ी हुई फीस का बोझ डाल दिया जाता है।
यूनिफॉर्म का एकाधिकार: किताबें ही नहीं, जूते से लेकर टाई तक खास दुकानों से खरीदने का फरमान जारी होता है।
सत्ता की चुप्पी पर बड़े सवाल?
जनता पूछ रही है कि बड़े-बड़े वादे करने वाले नेता और कड़क शासन दिखाने वाला प्रशासन इस मुद्दे पर गूंगा-बहरा क्यों बना है?
क्या इन प्राइवेट स्कूलों के पीछे रसूखदार नेताओं का संरक्षण है?
क्या खुद नीति निर्माताओं के अपने स्कूल इस सिंडिकेट का हिस्सा हैं?

अगर नहीं, तो अब तक इन पर सख्त कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्यों नहीं रद्द की जाती इन स्कूलों की मान्यता?
सुधार संवाद की अपील: अब चुप मत बैठिए!
अभिभावकों, यह आपकी मेहनत की कमाई है। अगर आप भी प्राइवेट स्कूलों की इस मनमानी, महंगी किताबों और नाजायज फीस से परेशान हैं, तो सुधार संवाद के ‘पोल खोल’ अभियान का हिस्सा बनें। अपनी आवाज उठाएं, क्योंकि आपकी खामोशी ही इन लुटेरों का हौसला बढ़ाती है।
”हम सवाल पूछना बंद नहीं करेंगे। जब तक हर बच्चे को उचित दाम पर शिक्षा और हर अभिभावक को सम्मान नहीं मिलता, सुधार संवाद प्रशासन को चैन से सोने नहीं देगा।”
प्रस्तुति:
दीपक मदान
संपादक: सुधार संवाद राष्ट्रीय हिंदी मासिक पत्रिका एवं दैनिक न्यूज़ पोर्टल
