दीपक मदान
हरिद्वार: हरिद्वार की गलियों में जो बाबा कभी खुद ₹100 में पांच लोगों का पेट भरकर मानवता की मिसाल पेश करते थे, आज उन्हीं ‘भंडारे वाले बाबा’ को जब नियति ने अकेले छोड़ दिया, तो हरिद्वार पुलिस उनके अपने परिवार के रूप में सामने आई।

मानवता का सर्वोच्च धर्म: वर्दी के पीछे धड़कता संवेदनशील हृदय
हरिद्वार के प्रसिद्ध ‘भंडारे वाले बाबा’ का निधन हो गया। उनके निधन के बाद जब कोई अपना उनकी अंतिम विदाई के लिए नहीं पहुँचा, तो यह दृश्य किसी के भी हृदय को झकझोर देने वाला था। लेकिन, ऐसे में उप-निरीक्षक खेमेंद्र गंगवार और उनकी टीम ने जो किया, उसने साबित कर दिया कि वर्दी का अर्थ केवल कानून का शासन नहीं, बल्कि इंसानियत की रक्षा भी है।

खेमेंद्र गंगवार, जो अपने विभाग में अपनी सरलता, ईमानदारी और मिलनसार व्यक्तित्व के लिए जाने जाते हैं, ने न केवल एक पुलिस अधिकारी का कर्तव्य निभाया, बल्कि एक बेटे का फर्ज अदा करते हुए बाबा को सम्मानजनक अंतिम विदाई दी।

जब एक अनजान बना परिवार का हिस्सा
खेमेंद्र गंगवार ने आगे बढ़कर स्वयं बाबा को मुखाग्नि दी। जिस व्यक्ति के आगे-पीछे कोई न था, उस अनजान व्यक्ति की अंतिम यात्रा में पुलिस एक परिवार की तरह उनके साथ खड़ी रही। यह केवल एक अंतिम संस्कार नहीं था, बल्कि इंसान की उस गरिमा का सम्मान था जो मृत्यु के बाद भी बनी रहनी चाहिए।
सच्ची सेवा: पद से ऊपर उठकर किए कर्म
खेमेंद्र गंगवार के इस कार्य ने समाज को एक बड़ा संदेश दिया है:
मानवता का पाठ: जब दुनिया स्वार्थ के पीछे भाग रही है, तब खाकी का यह मानवीय चेहरा उम्मीद की एक किरण जगाता है।
इंसानियत का धर्म: सच्ची सेवा वह है जिसमें पहचान या रिश्ते की अपेक्षा न हो।
कर्म ही परिचय: जीवन का सबसे बड़ा परिचय हमारा पद नहीं, बल्कि हमारे निस्वार्थ कर्म होते हैं।
इस घटना ने एक बार फिर सिद्ध किया है कि हरिद्वार की पुलिस न केवल अपराधियों पर नकेल कसने में सक्षम है, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर वह बेसहारा लोगों का कंधा और सहारा भी बनती है। खेमेंद्र गंगवार जैसे अधिकारी न केवल पुलिस विभाग की शोभा बढ़ाते हैं, बल्कि समाज के लिए एक प्रेरणा का स्रोत हैं।
सलाम है ऐसी पुलिस और ऐसी संवेदना को, जो वर्दी के भीतर एक धड़कते हुए दिल का परिचय देती है।
