सम्पादक :- दीपक मदान
उत्तराखंड को ‘नंबर वन’ राज्य बनाने के दावों के बीच, देश की सबसे बड़ी ऑडिट संस्था ‘कैग’ (CAG) की हालिया रिपोर्ट ने प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था और त्रिवेंद्र-धामी सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विधानसभा के पटल पर रखी गई इस रिपोर्ट के बाद अब यह सवाल तैरने लगा है कि क्या देवभूमि में भ्रष्टाचार और लापरवाही की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि अरबों रुपये जनता के टैक्स की कमाई हवा में उड़ाई जा रही है?
5 अरब की बिजली ‘गुल’, अंधेरे में जनता और घाटे में विभाग
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, रुड़की, लक्सर, रुद्रपुर और आसपास के मैदानी इलाकों में ऊर्जा निगम (UPCL) की भारी लापरवाही के कारण 964 मिलियन यूनिट बिजली सीधे तौर पर ‘लाइन लॉस’ और तकनीकी कुप्रबंधन की भेंट चढ़ गई। बाजार मूल्य के हिसाब से इसकी कीमत लगभग 488 करोड़ रुपये (करीब 5 अरब) आंकी गई है। एक तरफ जहां रुड़की और आसपास का आम नागरिक भीषण गर्मी में लो-वोल्टेज और बिजली कटौती से त्रस्त है, वहीं दूसरी तरफ अधिकारियों की नाक के नीचे अरबों की बिजली बर्बाद हो गई। सूत्रों का कहना है कि इस मामले में विभाग के ऊंचे पदों पर बैठे अधिकारियों की मिलीभगत और प्राइवेट वेंडर्स को फायदा पहुंचाने के खेल की भी बू आ रही है।
स्मार्ट सिटी या ‘घोटालों की सिटी’? देहरादून में करोड़ों का हेरफेर
सिर्फ बिजली ही नहीं, बल्कि देहरादून स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट को लेकर भी कैग ने तीखे तेवर अपनाए हैं। करोड़ों रुपये के बजट का समय पर इस्तेमाल न होना, घटिया निर्माण कार्य और बजट के डायवर्जन (दुरुपयोग) ने यह साफ कर दिया है कि राजधानी के सौंदर्यीकरण के नाम पर सरकारी धन का किस कदर बंदरबांट हुआ है।
सूत्रों का दावा: जांच के दायरे में आनी चाहिए मंत्रियों और शीर्ष अधिकारियों की संपत्तियां!
इस महा-खुलासे के बाद अब राजनीतिक गलियारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच धामी सरकार को घेरने की तैयारी तेज हो गई है। सचिवालय सूत्रों और राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि मामला सिर्फ तकनीकी खराबी का नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बड़ा नेक्सस (साठगांठ) काम कर रहा है।
हाई-लेवल जांच की मांग: सामाजिक संगठनों का कहना है कि जब तक इस पूरे मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) जैसी स्वतंत्र एजेंसी से नहीं कराई जाती, तब तक बड़ी मछलियां कभी जाल में नहीं आएंगी।
संपत्तियों की जांच की उठ रही आवाज: गलियारों में यह चर्चा भी जोरों पर है कि ऊर्जा विभाग, स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट और संबंधित मंत्रालयों के शीर्ष अधिकारियों व मंत्रियों की बेनामी संपत्तियों की भी जांच होनी चाहिए, ताकि यह साफ हो सके कि जनता के नुकसान की कीमत पर किसकी तिजोरियां भरी गईं।
’जीरो टॉलरेंस’ पर सवाल: विपक्ष का आरोप है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की ‘जीरो टॉलरेंस’ (भ्रष्टाचार पर शून्य सहशीलता) की नीति केवल कागजों तक सीमित रह गई है और असल में उत्तराखंड बेईमानों और भ्रष्ट अफसरों के लिए एक सुरक्षित पनाहगाह बनता जा रहा है।
नोट: यह पूरी रिपोर्ट भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) द्वारा विधानसभा में पेश किए गए आधिकारिक आंकड़ों, सार्वजनिक बयानों और सचिवालय के अंदरूनी सूत्रों से मिली जानकारी पर आधारित है। पत्रकारिता के तय मानकों के तहत, इस रिपोर्ट का उद्देश्य किसी की व्यक्तिगत छवि धूमिल करना नहीं, बल्कि सरकारी धन के नुकसान पर जवाबदेही तय करना है।
