विशेष संवाददाता :- सारिका
इतिहास केवल पन्नों पर नहीं लिखा जाता, वह हमारी कलाकृतियों, मूर्तियों और बेशकीमती गहनों में सांस लेता है। लेकिन भारत के इतिहास की ये ‘सांसें’ आज सात समंदर पार लंदन के ठंडे म्यूजियमों में कैद हैं। हाल ही में न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी ने कोहिनूर की वापसी की वकालत कर एक सोई हुई बहस को फिर से जिंदा कर दिया है।
कोहिनूर: सिर्फ एक हीरा नहीं, भारत की आत्मा का टुकड़ा
ममदानी की यह मांग तब आई है जब ब्रिटेन के किंग अमेरिका के दौरे पर हैं। उन्होंने साफ कहा— “मौका मिला तो मैं किंग से कहूंगा कि भारत की अमानत उसे वापस कर दें।” कोहिनूर का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। गोलकुंडा की खदानों से निकला यह हीरा मुगलों के पास रहा, फिर नादिर शाह इसे ईरान ले गया। पंजाब के शेर महाराजा रणजीत सिंह इसे वापस भारत लाए, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद जब उनके वारिस दलीप सिंह की उम्र महज छोटी थी, तब ईस्ट इंडिया कंपनी ने धोखे और कूटनीति से इसे छीन लिया। आज यह ‘शापित’ कहा जाने वाला हीरा ब्रिटिश ताज की शोभा बढ़ा रहा है, जबकि इसका असली घर भारत की मिट्टी है।
लूट की फेहरिस्त: कोहिनूर तो बस एक शुरुआत है
ब्रिटेन के पास केवल हीरा ही नहीं, बल्कि हमारी वीरता और भक्ति के प्रतीक भी हैं:
टीपू सुल्तान की विरासत: मैसूर के शेर टीपू सुल्तान की वह तलवार, जिसकी धार से अंग्रेज कांपते थे, और उनकी अंगूठी आज भी लंदन में है।
सुलतानगंज बुद्धा: बिहार से मिली भगवान बुद्ध की 2.3 मीटर ऊंची वह विशाल प्रतिमा, जो हमारी धातु कला का बेजोड़ नमूना है, आज बर्मिंघम के म्यूजियम की शोभा बढ़ा रही है।
अमरावती स्तूप: आंध्र प्रदेश के प्राचीन बौद्ध स्तूप की नक्काशीदार मूर्तियां, जो भारत के स्वर्णिम काल की गवाह थीं, अब विदेशी सैलानियों के लिए ‘नुमाइश’ की वस्तु बनकर रह गई हैं।
शाहजहाँ का वाइन कप: वह प्याला जिसे ताजमहल बनाने वाले हाथों ने छुआ था, आज भारत से मीलों दूर है।
क्या कहते हैं अंग्रेज और क्या है हमारा हक?
ब्रिटेन का तर्क बड़ा अजीब है। वे कहते हैं कि— “हम इन चीजों की देखभाल अच्छे से कर रहे हैं।” लेकिन क्या किसी बच्चे को उसकी मां से सिर्फ इसलिए दूर रखा जा सकता है कि पालने वाला ज्यादा अमीर है?
मिस्र, ग्रीस और नाइजीरिया जैसे देशों ने अपनी धरोहरें वापस पाकर यह साबित कर दिया है कि अगर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाया जाए, तो ‘इतिहास का न्याय’ संभव है।
भावुक प्रश्न: कब खत्म होगा यह औपनिवेशिक वनवास?
ये वस्तुएं केवल पत्थर, धातु या कोयले का टुकड़ा नहीं हैं। ये हमारी आस्था, हमारे पूर्वजों के संघर्ष और हमारी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं। जब एक भारतीय लंदन के म्यूजियम में ‘सरस्वती’ की मूर्ति या ‘बुद्ध’ की प्रतिमा को कांच के पीछे देखता है, तो गर्व से ज्यादा दर्द महसूस होता है।
’सुधार संवाद’ का नजरिया:
धरोहरों की वापसी केवल कूटनीतिक जीत नहीं होगी, बल्कि यह उस अपमान का मरहम होगा जो सदियों की गुलामी ने हमें दिया है। ममदानी जैसे भारतीय मूल के लोगों की आवाज वैश्विक मंच पर गूंज रही है, और वह दिन दूर नहीं जब भारत अपनी इन खोई हुई ‘सांसों’ को अपनी धरती पर फिर से महसूस करेगा।
संपादकीय नोट: यह रिपोर्ट हमें याद दिलाती है कि हमारी विरासत पर हमारा अधिकार जन्मसिद्ध है। जो चीजें युद्ध या धोखे से छीनी गईं, उन्हें ‘उपहार’ कहना इतिहास के साथ भद्दा मजाक है।
