सम्पादक :- दीपक मदान
बिलासपुर | सुधार संवाद डेस्क छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने शिक्षाकर्मियों के वेतनमान और सेवा लाभों को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि पंचायत विभाग के नियमों के तहत नियुक्त शिक्षाकर्मी, स्कूल शिक्षा विभाग के नियमित सरकारी शिक्षकों के समान वेतनमान या अन्य क्रमोन्नति लाभ पाने के कानूनी हकदार नहीं हैं।
मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने खारिज की अपील
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने उन शिक्षाकर्मियों की अपील को खारिज कर दिया, जिन्होंने 10 और 20 वर्ष की सेवा पूरी होने पर ‘क्रमोन्नति वेतनमान’ की मांग की थी। अदालत ने एकलपीठ के उस पुराने आदेश को बरकरार रखा है जिसमें याचिकाकर्ताओं की मांग को नामंजूर कर दिया गया था।
क्या था पूरा मामला?
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति शुरुआत में पंचायत विभाग के अंतर्गत शिक्षाकर्मी ग्रेड-2 और ग्रेड-3 के रूप में हुई थी। उनकी सेवाओं को जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) द्वारा नियमित किया गया था। बाद में, राज्य सरकार की नीति के तहत इन शिक्षाकर्मियों की सेवाओं को स्कूल शिक्षा विभाग में समाहित (Merge) कर दिया गया था।
शिक्षाकर्मियों का तर्क था कि वे लंबे समय से अपनी सेवाएं दे रहे हैं, इसलिए 10 मार्च 2017 के सरकारी परिपत्र के आधार पर उन्हें सेवा के 10 और 20 वर्ष पूरे होने पर उच्चतर वेतनमान का लाभ मिलना चाहिए।
अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने सेवा नियमों की सूक्ष्म व्याख्या करते हुए निम्नलिखित बिंदु स्पष्ट किए:
अलग-अलग कैडर: अदालत ने माना कि पंचायत विभाग के तहत की गई सेवा को स्कूल शिक्षा विभाग की सेवा के समकक्ष नहीं माना जा सकता। दोनों के कैडर और भर्ती नियम पूरी तरह अलग हैं।
परिपत्र का दायरा: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2017 का संबंधित परिपत्र विशेष रूप से स्कूल शिक्षा विभाग के नियमित सरकारी शिक्षकों के लिए था, न कि पंचायत कैडर से आए शिक्षाकर्मियों के लिए।
समानता का सिद्धांत: हाईकोर्ट ने कहा कि “समानता का दावा केवल तभी किया जा सकता है जब कर्मचारी हर महत्वपूर्ण पहलू में समान स्थिति में हों।” चूंकि शिक्षाकर्मियों की नियुक्ति प्रक्रिया और नियम अलग थे, इसलिए वे नियमित शिक्षकों के समान लाभों का दावा नहीं कर सकते।
पूर्व के फैसलों का संदर्भ
याचिकाकर्ताओं ने अपनी दलील को पुख्ता करने के लिए पूर्व के कुछ अदालती फैसलों का हवाला दिया था। हालांकि, खंडपीठ ने उन्हें अप्रासंगिक बताते हुए कहा कि उन मामलों में लाभ पाने वाली शिक्षिका की नियुक्ति सीधे सरकारी शिक्षक के रूप में हुई थी, जबकि वर्तमान अपीलकर्ता मूल रूप से पंचायत विभाग के अधीन थे।
निष्कर्ष: इस फैसले से यह साफ हो गया है कि शिक्षाकर्मियों का स्कूल शिक्षा विभाग में संविलियन होने के बावजूद, उनकी पिछली ‘पंचायत सेवा’ को नियमित सरकारी शिक्षक की सेवा के बराबर मानकर पुराने लाभ नहीं दिए जा सकते। इस निर्णय का राज्य के हजारों शिक्षाकर्मियों की भविष्य की याचिकाओं पर गहरा असर पड़ने की संभावना है।
