संपादक दीपक मदान
हरिद्वार | 15 अप्रैल, 2026
उत्तराखंड शासन द्वारा हाल ही में स्कूलों में ‘वॉटर बेल’ बजाने और हीटवेव से लड़ने के बड़े-बड़े दावे किए गए हैं। मुख्य सचिव की मैराथन बैठकों में पानी पीने के अंतराल तय किए जा रहे हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन इन “छिटपुट” घोषणाओं के जरिए अभिभावकों के असली दर्द को दबाने की कोशिश कर रहा है?

ठंडा पानी या फीस की मार: जनता को क्या चाहिए?
हैरानी की बात है कि प्रशासन गर्मी में डिहाइड्रेशन की चिंता तो कर रहा है, लेकिन उन प्राइवेट स्कूलों पर लगाम कसने में नाकाम है जो एडमिशन और किताबों के नाम पर मध्यमवर्ग का ‘खून चूस’ रहे हैं।
- क्या सिर्फ वॉटर बेल बजाने से शिक्षा व्यवस्था में सुधार आ जाएगा?
- नर्सरी से लेकर माध्यमिक कक्षाओं तक, भारी-भरकम फीस और कमीशनखोरी का जो खेल चल रहा है, उस पर मुख्य सचिव की ‘समीक्षा बैठक’ खामोश क्यों है?

जनता को गुमराह करने का नया पैंतरा?
एक तरफ सरकार कहती है कि पानी की किल्लत होने पर निर्माण कार्यों पर रोक लगा दी जाएगी, वहीं दूसरी ओर बुनियादी सुविधाओं के नाम पर जनता को कागजी प्लान (Action Plan) में उलझाया जा रहा है।
“सुधार संवाद का सवाल:” प्रशासन स्कूलों में जाकर बच्चों की बोतलों में पानी नहीं, बल्कि उनके बस्ते के बोझ और उनके माता-पिता की खाली होती जेब की फिक्र क्यों नहीं करता?
प्रशासन के लिए कड़े सवाल:
- ग्राउंड रिपोर्टिंग क्यों नहीं? अधिकारी बंद कमरों में वर्चुअल बैठकें करने के बजाय प्राइवेट स्कूलों के क्लासरूम में जाकर बच्चों से हकीकत क्यों नहीं जानते?
- सुविधाओं का अभाव: कई सरकारी स्कूलों में बिजली-पंखे तक नसीब नहीं हैं, वहां सिर्फ ‘बेल’ बजाने के आदेश देना क्या मजाक नहीं है?
- कमीशनखोरी पर चुप्पी क्यों? ड्रेस, जूते और किताबों के नाम पर जो लूट मची है, उस पर “कड़ा रुख” अपनाने के बजाय प्रशासन पानी और छांव की बातें कर जनता को पागल समझ रहा है।
निष्कर्ष: दिखावा छोड़िए, काम कीजिए
प्रशासन को समझना होगा कि जनता अब जागरूक है। वॉटर बेल जैसी खबरें सुर्खियां तो बन सकती हैं, लेकिन समाधान नहीं। अगर प्रशासन वास्तव में नागरिकों का हित चाहता है, तो उसे स्कूलों की मनमानी फीस माफ करने और शिक्षा के गिरते स्तर पर “सर्जिकल स्ट्राइक” करने की जरूरत है।
वक्त आ गया है कि प्रशासन ‘पब्लिक को उलझाना’ बंद करे और उन मुद्दों पर काम करे जिससे आम आदमी का जीवन वाकई आसान हो सके।
‘सुधार संवाद’ (जनहित की निर्भीक आवाज)।
